झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड

झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड


🕯️ झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड 🕯️

(एक सच्ची घटना से प्रेरित सबसे खौफ़नाक हॉरर कहानी)

क्या आपने कभी सोचा है कि एक मंदिर के नीचे बना प्राचीन कुआं कितनी खौफनाक दास्तानें छुपाए बैठा हो सकता है?
इंदौर की झूलेलाल बावड़ी में घटी वह भयावह घटना, जिसने दर्जनों लोगों की जान ले ली, सिर्फ़ एक हादसा नहीं थी…
बल्कि यह था एक प्राचीन श्राप का जागना


---झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड


इस कहानी में आप पाएंगे:

  • आधी रात को गूंजती घंटी और चीखें 🔔

  • अंधेरे कुएं से आती मृत आत्माओं की परछाइयाँ 👻

  • और वह खूनी रहस्य, जो सदियों से दबा पड़ा था।


---झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड


यह सिर्फ़ एक हादसे की दास्तान नहीं, बल्कि एक ऐसे भूतिया कुएं की सच्चाई है, जहाँ जाना मौत को बुलाना है।

अगर आपमें हिम्मत है तो पूरी कहानी ज़रूर पढ़ें… लेकिन सावधान ⚠️, क्योंकि इसके बाद शायद आप कभी किसी कुएं में झांकने की हिम्मत ना करें।



---झूलेलाल बावड़ी : मौत का कुंड


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झूलेलाल बावड़ी: मौत का कुंड

(A Horror Novel Inspired by the Indore Stepwell Tragedy)


भाग 1 – हादसे की रात
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इंदौर के सिलावटपुरा का इलाका, 30 मार्च 2023।
राम नवमी का दिन था, भीड़ इतनी कि मंदिर की सीढ़ियाँ कांप रही थीं। बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर के बीचोंबीच वह पुरानी बावड़ी थी, जिस पर लोहे की ग्रिल और टाइलों की परत चढ़ी थी। दशकों से वह ढकी पड़ी थी, और लोग भूल चुके थे कि उसके नीचे गहराई में मौत का अंधेरा है।

मंदिर के पुजारी बार-बार चेतावनी देते रहे थे कि यह ज़मीन खोखली है, मगर उत्सव, भीड़ और जयकारों के बीच कोई सुनने वाला नहीं था।

घड़ी में दोपहर का तीसरा पहर हुआ ही था कि अचानक—भारी धमाका हुआ। टाइलें टूटकर धँस गईं और दर्जनों लोग, औरतें-बच्चे समेत, चीखते हुए उस बावड़ी में गिर पड़े।

भीड़ पागल हो गई। चारों तरफ़ अफरा-तफरी, खून से सनी चीखें, पानी में डूबते लोग। जिन्होंने नीचे झाँककर देखा, उनके होश उड़ गए—बावड़ी का गहरा अंधेरा मानो आत्माओं का मुँह खोलकर सबको निगल रहा था।

36 लाशें निकाली गईं।
लेकिन सवाल ये था—क्या सचमुच सिर्फ़ हादसा था?


उस रात, जब प्रशासन शवों को निकालकर अस्पताल भेज चुका था और मंदिर सूना पड़ा था, तब भी बावड़ी के भीतर से पानी के थपेड़े और कराहों की आवाज़ें आती रहीं।

पास के लोग कसम खाते हैं कि आधी रात को मंदिर की घंटियाँ अपने-आप बजने लगीं, और किसी अदृश्य भीड़ की चिल्लाहट हवा में गूँजने लगी—"हमें बाहर निकालो... हमें बाहर निकालो..."

स्थानीय पंडितों ने दावा किया कि यह कोई साधारण हादसा नहीं था, बल्कि बावड़ी का श्राप था, जो दशकों पहले दिया गया था।

और यह श्राप क्यों था?
इसका रहस्य भाग 2 में खुलेगा…




👁️‍🗨️ “बेलेश्वर बावली: आत्माओं का अंधकार”


भाग 2 – आत्माओं का श्राप
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1. हादसे के बाद की खामोशी

राम नवमी के उस हादसे के बाद, पूरा इंदौर सदमे में था।
मंदिर के दरवाज़े बंद कर दिए गए। पुलिस ने जगह सील कर दी।
लेकिन रात को मंदिर के आसपास रहने वाले लोगों ने कुछ अजीब चीज़ें नोटिस करनी शुरू कीं।

  • आधी रात को बावली से पानी छपाक की आवाज़ें आती थीं—जैसे कोई बार-बार अंदर गिर रहा हो।

  • कई लोगों ने कहा कि उन्होंने बच्चों की चीखें सुनीं।

  • और एक आदमी ने दावा किया कि उसने अपनी मरी हुई बहन को बावली की ग्रिल के पीछे खड़े देखा—उसका चेहरा फूला हुआ, आँखें बाहर निकली हुईं और होंठों से पानी टपक रहा था।

धीरे-धीरे लोगों ने मंदिर के पास आना बंद कर दिया।
लेकिन प्रशासन को मजबूरी थी—शवों के साथ हुए हादसे की जाँच करनी थी।

2. तहख़ाने का रहस्य

ASI (Archaeological Survey of India) की टीम मंदिर के नीचे उतरी।
पुराने नक्शे बताते थे कि बावली सिर्फ़ पानी का स्रोत नहीं थी—बल्कि उसके चारों ओर तहख़ानों का जाल बना हुआ था।

जाँच में पता चला कि अंग्रेज़ों के समय, इस बावली को बंद कर दिया गया था क्योंकि इसके गुप्त कमरों का इस्तेमाल गुप्त फाँसीघर (secret execution chamber) के रूप में होता था।
1857 के गदर के दौरान, यहाँ कई सिपाहियों को ज़िंदा नीचे फेंक दिया गया था।

उन तहख़ानों की दीवारों पर अब भी खून के धब्बे जमे थे।
और कुछ दीवारों पर नाखूनों से उकेरे गए शब्द पढ़े गए—
👉 “हमें छोड़ दो…”
👉 “हम जलते हैं…”
👉 “राम बचा ले…”

टीम में शामिल एक जवान ने मज़ाक में कहा,
“ये सब अफवाहें हैं, इतिहास की कहानियाँ।”
पर उसी रात, उसी जवान का शव पास के कुएँ में तैरता मिला।
चेहरे पर वही घुटन का भाव था, जो बावली में गिरे मृतकों का था।

3. आत्माओं का खेल
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जिन 36 लोगों की मौत उस हादसे में हुई थी, उनकी आत्माएँ चैन से नहीं सो पाईं।
क्योंकि वे बावली की पुरानी आत्माओं के चंगुल में फँस गईं।

कहा जाता है, बावली में पहले से 72 आत्माएँ बंद थीं—1857 के शहीद, कुछ अंग्रेज़ सैनिक, और वे बच्चे जो सदियों में उसमें गिरे।
अब उनकी संख्या बढ़कर 108 हो चुकी थी।

रात को जब कोई मंदिर के पास जाता, तो हवा में राम नाम की जगह कराहें सुनाई देतीं।
कभी पानी के बुलबुले से चेहरे बनते, कभी हाथ बाहर निकलने की कोशिश करते।
लोगों का कहना था कि बावली अब “प्यासा” हो चुकी थी—
👉 वह इंसानी आत्माओं को पीकर और ताकतवर बन रही थी।

4. एक परिवार की त्रासदी

हादसे में मरने वाली एक महिला – सुनीता बाई – के पति रमेश ने अपनी पत्नी की आत्मा को सपनों में देखा।
वह गीले कपड़ों में, टूटी हड्डियों के साथ उसके पास खड़ी रहती और कहती—
“मुझे बाहर निकालो… मैं वहीं अटकी हूँ…”

रमेश बावली के पास गया।
लोगों ने रोका, लेकिन उसने कहा—
“मेरी पत्नी मुझे बुला रही है।”

जैसे ही वह ग्रिल के पास पहुँचा, अचानक काले पानी का हाथ बाहर निकला और उसे अंदर खींच लिया।
लोगों ने सिर्फ़ उसकी चीख सुनी—“बचाओ!”—और फिर सन्नाटा।
पानी की सतह पर सिर्फ़ लाल बुलबुले उठे।

अब गाँव में यह फैल गया कि बावली सिर्फ़ मृतकों को नहीं खींचती, बल्कि उनके जिंदा परिजनों को भी बुलाती है।

5. तांत्रिक का आगमन

स्थानीय लोग डर से बेहाल थे। तब गाँव के बुजुर्गों ने एक तांत्रिक को बुलाया—भैरवनाथ।
वह दावा करता था कि बावली में “जल-भूत” नहीं, बल्कि एक श्रापित आत्मा है, जिसे अंग्रेज़ों ने मारकर उसी बावली में डाला था।

कहानी यह थी कि 1857 में एक संत ने अंग्रेज़ों को श्राप दिया था—
👉 “यह बावली कभी शांत नहीं होगी। यह जितनी आत्माएँ पिएगी, उतनी और भूखी होती जाएगी।”

भैरवनाथ ने हवन किया, मंत्र पढ़े।
रात को बावली के चारों ओर लाल धुंध फैल गई।
और अचानक… बावली से सैकड़ों हाथ बाहर निकले और भैरवनाथ को पकड़ लिया।

लोगों ने चीखते हुए देखा—उसका शरीर बावली में खिंच गया।
और पानी की सतह पर खून का झाग फैल गया।

6. अंतिम रहस्य

जाँच-पड़ताल करने वालों को बावली के तहख़ाने में एक लोहे का बक्सा मिला।
उसमें अंग्रेज़ी दस्तावेज़ थे। लिखा था कि यह बावली “मौत की जेल” थी—
यहाँ जिन कैदियों को डुबोया जाता, उनकी आत्माएँ पानी में बाँध दी जाती थीं।

यानी बावली सिर्फ़ एक जलाशय नहीं, बल्कि एक आत्माओं का कैदख़ाना थी।

7. खौफनाक अंत

आज भी वह मंदिर आधिकारिक रूप से बंद है।
लेकिन आसपास के लोग कसम खाते हैं कि रात को बावली की गहराई से चीखें आती हैं।
कभी बच्चे की हँसी, कभी औरत की कराह, कभी बूढ़े की दहाड़।

कई बार राहगीर कसम खाते हैं कि उन्होंने पानी की सतह पर 108 चेहरों को तैरते देखा है।
हर चेहरा आँखें फाड़कर मदद माँगता है।

और कहते हैं—
👉 अगर कोई बावली के पास जाकर ज़्यादा देर खड़ा हो जाए, तो उसका नाम उन चेहरों की सूची में शामिल हो जाता है।



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